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Digital and Online protocol of communication

:Don’t let passion become tension

इंटरनेट का सही इस्तेमाल : पैशन न बन जाए टेंशन

नेहा ने मम्मी को इतना परेशान कभी नहीं देखा था। मम्मी ऑफिस से आईं और अपना पर्स एक तरफ डाल कर निराश और डरी हुई सी बैठ गईं। आज उन्होंने घर आकर नेहा से पानी भी नहीं माँगा। मम्मी जब भी घर लौटती हैं तो नेहा को गले लगाकर उसका माथा चूमती हैं, नेहा अपनी मम्मी को पानी देती है। और फिर वे लोग दिन भर की अपनी बातें करती हैं। मम्मी ऑफिस की टेंशन में कभी भी नेहा पर गुस्सा नहीं निकालतीं, तभी नेहा को मम्मी से बहुत प्यार है। पापा तो ऑफिस का काम भी घर में ले आते हैं, मगर मम्मी नहीं। मम्मी उसके लिए बहुत ही टेस्टी खाना बनाती हैं, उसके लिए यम्मी स्नैक्स बनाती हैं। मगर आज वो इतना डर कर क्यों आईं हैं?

नेहा की हिम्मत नहीं हो रही थी कि वह मम्मी से पूछ ले। वह रोज मम्मी का फोन लेकर बैठ जाती थी। मम्मी के फोन में फेसबुक और व्हाट्सएप पर आने वाले वीडियो और फोटो देखा करती थी। मम्मी और पापा उसे मना नहीं करते थे, कक्षा छः में पढने वाली नेहा बहुत होशियार थी, उसे हर बात बहुत अच्छी तरह समझ में आती थी। वह हमेशा फर्स्ट या सेकण्ड ही आई थी। इसलिए अपनी टीचर की भी प्रिय छात्राओं में से एक थी। कितना मुश्किल होता है अपनी टीचर्स की अपेक्षाओं पर खरा उतरना! मगर नेहा के लिए यह बिलकुल भी मुश्किल नहीं था क्योंकि वह हर विषय में सबसे अच्छे अंक लाती थी. डिबेट में भी वह हिस्सा लेती थी और हर महान व्यक्तित्व के बारे में उसे पता था। ऐसी नेहा सबकी लाड़ली थी और खास तौर पर प्रिंसिपल मैडम तो नेहा को बहुत ही प्यार करती थीं। उन पर कई बार नेहा की तरफदारी करने के आरोप भी लगे, मगर उन्होंने किसी की बात नहीं सुनी। नेहा घर पर भी अपनी मम्मी पापा की जान थी। जैसे ही मम्मी पापा घर पर आते, नेहा अपनी मम्मी और पापा के लिए पानी लाती थी और अब तो वह कभी कभी मम्मी के लिए सैंडविच भी बना लेती थी। मम्मी के लैपटॉप पर उसे नई नई बातें पता चलती थीं। ये मम्मी का ऑफिशियल लैपटॉप था, जिस पर वह अपने होमवर्क के लिए लिंक देखती थी। मम्मी उसे मना करती थी कि होमवर्क के अलावा कुछ और नहीं देखना, कोई और लिंक नहीं खोलना। मगर जैसे जैसे वह बड़ी हो रही थी उसे नए नए गाने सुनने और बड़े बड़े कलाकारों की फिल्में और किस्से पढने में मज़ा आने लगा था। स्कूल में उसकी कई सहेलियां इंटरनेट पर की जाने वाली बातें उसे बताती थीं। उसकी सहेली रीमा ने उसे इन्टरनेट के तमाम लिंक्स और उनमें क्या क्या है, बताया था। वैसे तो नेहा समझदार थी, मगर न जाने क्यों रीमा के दिखाए गए सब्जबाग में फंस जाती थी। रीमा के कारण पहले भी एक बार उसकी शिकायत और लडकियां मैडम से कर चुकी थीं। रीमा के कारण वह ऑनलाइन शॉपिंग, फिल्मी गानों, फैशन साईट पर जाने लगी थी। और उन लिंक्स के साथ भी छेड़छाड़ करने लगी थी जिन्हें शायद नहीं क्लिक करना चाहिए था।

एक दिन स्कूल में ही कंप्यूटर के पीरियड में रीमा और नेहा के कंप्यूटर पर कई ऐसे लिंक की हिस्ट्री मिली, जिन्हें सर्च करने की इजाजत स्कूल में नहीं थी। रीमा की छवि स्कूल में अच्छी नहीं थी। वैसे तो रीमा और नेहा दोनों के ही मम्मी और पापा नौकरी करते थे, और दोनों अपने अपने घरों में अकेली रहतीं थी। पर नेहा जहां घर आकर अपना होमवर्क पूरा करती थी, और अपनी मम्मी के लिए कुछ न कुछ बनाने की फिराक में रहती थी, तो वहीं रीमा अपना सारा रोब अपने घर पर उसकी देखभाल करने वाली आया पर निकालती थी। नेहा के घर में आया नहीं थी, बल्कि नेहा ही घर में अपनी मम्मी की मदद किया करती थी। नेहा और रीमा दोनों ही की शिकायत स्कूल में प्रिंसिपल मैडम से की गयी। हालांकि कंप्यूटर टीचर बहुत गुस्सा थीं, और वे उसके माता पिता को बुलाकर शिकायत करना चाहती थीं। मगर नेहा के अच्छे एकेडमिक रिकोर्ड्स के कारण उसे केवल चेतावनी देकर छोड़ दिया गया था।
प्रिंसिपल मैडम ने उसे समझाते हुए कहा था-

““नेहा, तुम अपना ध्यान इस समय पढाई में लगाओ। इस समय तुम्हारा पढ़ना बहुत जरूरी है। इंटरनेट पर किया गया कोई भी खेल तुम्हारे लिए और दूसरों के लिए खतरनाक हो सकता है। क्या तुम जानती हो कि इससे एक एक दिन तुम और तुम्हारे घरवाले किसी मुसीबत में पड़ सकते हैं? और तुम जिसका लैपटॉप इस्तेमाल करोगी वह भी मुसीबत में आ जाएगा।“”

उस दिन तो उसने प्रिंसिपल मैडम की बात को सुन लिया था मगर कल फिर से वह इंटरनेट पर प्रोजेक्ट पूरा करते करते कई और वेबसाईट पर चली गयी थी और कई लिंक शेयर कर दिए थे। उसे नहीं पता था कि कौन से लिंक थे?

नेहा ने परेशान मम्मी को पानी देते हुए पूछा-
““मम्मी क्या हुआ है? आप इतनी परेशान क्यों हैं?””
“”नेहा.. क्या तुमने कल मेरे लैपटॉप से कुछ लिंक शेयर किए थे?”” मम्मी ने पूछा
““नहीं मम्मी, वो शायद गलती से हो गए होंगे!”” नेहा ने झूठ बोला, जबकि उसने जानबूझकर ही सारी साइट खोली थीं। उसने मन की मन प्रार्थना की- ““हे भगवान, अब झूठ नहीं बोलूंगी। इस बार मम्मी को बचा लो।“” मगर फिर उसके मन ने कहा- ““नहीं नेहा, झूठ नहीं, तुम सच कह दो।“”
“”मम्मी, दरअसल मैंने रीमा के कहने पर कुछ वेबसाइट पर लिंक शेयर किए थे, मगर मुझे नहीं पता था कि ये आपके लिए मुसीबत बन जाएंगे। मुझे माफ कर दीजिए। अब ऐसा नहीं होगा!”” रीमा ने डरते डरते हुए और रोते हुए कहा।
“”ओह नेहा रोओ मत। तुम्हें पता मेरे जीमेल एकाउंट से गूगल के सभी सर्च कनेक्ट होती हैं, और मैं जो भी शेयर करती हूँ, वह सबको पता चल जाता है। आज ऑफिस में उन साइट्स और लिंक्स के कारण मेरा न केवल मजाक बना बल्कि मेरे बॉस ने मुझे लैपटॉप छीनने की धमकी दे दी।”” मम्मी ने नेहा से कहा.
“”अरे मम्मी ऐसा क्या था उन लिंक्स में?”” नेहा भी डर गयी।

मम्मी ने शांत रहते हुए उसे समझाया- ““बेटा, कई लिंक्स ऐसे होते हैं, जिन पर क्लिक करने से हैकिंग वाली या कभी कभी गंदी गंदी वेबसाईट खुल जाती हैं, जो आपके कंप्यूटर के सारे जरूरी डेटा को गायब कर देती हैं या चुरा लेती हैं। और जब किसी को पता चलता है कि हम इन साइट्स को यूज़ कर रहे हैं, तो हमें वे लोग या तो गंदा समझते हैं या उन्हें लगता है कि हम जानबूझ कर ऐसा कर रहे हैं।” और हम तो गंदे हैं नहीं...क्यों..? फिर हम गंदे साबित क्यों हों? ”

नेहा को अब पता चल रहा था कि उसने क्या गलती कर दी थी। उसने मन ही मन ये गलती न करने का फैसला लिया और मम्मी को पानी देते हुए कहा-
““मम्मी, आप चिंता मत करिए। अब मैं और जिम्मेदारी के साथ आपका लैपटॉप यूज़ करूंगी और जो गलती हुई उसे दोबारा नहीं करूंगी।“”
मम्मी ने उसे गले लगा लिया- ““मेरी प्यारी बेटी, अब चलो पकौड़े बनाए जाएं?””
नेहा ने रीमा का फोन अपने फोन से हटा दिया, और अब वह उससे कभी बात नहीं करेगी। इन्टरनेट जिम्मेदारी के साथ इस्तेमाल करने वाली चीज है। ये उसे आज समझ में आ गया था।

……

Abhishek had signed up for Facebook which had opened a new bright and colourful world for him. His father had not approved of his decision to join Facebook. They did not want Abhishek to get busy with Facebook at such a young age. Abhishek –a Class 12th student did not agree. He thought that if most of his friends were using Facebook, then why shouldn’t he? This year he had learnt about his rights in Political Science and he believed that it was his right to be able to use all latest technologies. He had argued with his father – “Papa, all my friends are on Facebook and they are enjoying a lot. Please let me make an account.”

Abhishek’s father knew that Abhishek, who dreamed to be an Engineer, was at an age where children usually got misled and while Internet helped children, it also misled them. Whenever he could, he had strictly controlled the flow of Internet on the home computer and laptop. But now Abhishek knew a workaround for almost all technologies and his father knew that he would not be able to stop Abhishek from using Facebook. So he warned Abhishek about Facebook and advised him how to be careful online before giving him permission to get a Facebook account. Abhishek was delighted. The world that had opened up in front of him was very attractive. He could now read anyone, see anyone’s post. With Facebook and Internet, he soon got connected with almost all his friends and relatives. He started sharing jokes and Shayri.

He was enjoying this. It seemed to him as if he has reached the world of his dreams. He started spending more time on Facebook than his studies. He was so addicted to ‘likes’ and ‘comments’ that all he talked about with his friends were his Facebook photos. He had fallen in with a group of friends who encouraged him all the time. They posted all sorts of comments on his every photo. He became very happy. But along with this, he also got addicted to visiting links that were not meant for kids his age. But he always thought that because he was eighteen now, he could do anything. He can like, share or write any post. He did not realize how he was wasting his precious time doing all this. He shared unsavory links due to which once his Father had to go to the police station too. His father had been able to convince the Police after much difficulty. After that, he had promised his father that from that day, he would never comment on such posts because of which his father’s job or society was affected adversely.

But he could not figure out how other people got so may likes. He had another friend who was on Facebook but was not very active. He just visited Facebook if he had some work. He only shared links related to engineering or ones with some important announcement which was necessary for children preparing for Engineering.

His profile picture was an old one and he did not change it regularly. Abhishek made fun of him but he soon saw that Vijay’s posts received more likes that his posts. He was surprised how such a geek could get more likes than him. Once Vijay had written a post against some wrong activity and thousands had shared it. These things surprised Abhishek. He posted frequently but no one liked his posts. He was getting jealous of Vijay because Vijay always got less marks than him and yet he was more popular than him on social networking sites.

He started getting worried and distracted. He could not digest his defeat on social networking sites. His studies started deteriorating – first because he wasted his time posting photos on Facebook and now because of Vijay. He was very troubled and started thinking that Facebook and Internet are useless. Because of Internet link he had almost landed in Jail but while Vijay’s posts were shared so widely, nothing ever happened to him. He could not understand how this could be. Mother and father’s darling Abhishek had been defeated by Facebook. While until last year he was not scared of any challenge, he could not win on social networking sites. His situation started worrying his father. Finally one day his father asked him –

“What is the matter, son?”
He told the reason for his problem – “Papa, I almost landed in Jail because of Internet and Facebook but Vijay? Vijay has become a hero!”
Papa laughed – “That’s it?”
Abhishek wondered how Papa handled such grave issues so easily. Sometimes he thought his father was Superman.

“Look, people read those posts on Facebook that they enjoy or could be useful to them. What you write shows your goal. And this world follows only those who have a worthwhile goal. If you want people to like your post like Vijay, you should also write something useful to people. Understood?” Papa lovingly slapped his head and asked. “Yes Papa.”

After Papa’s advice Abhishek changed the way he used Facebook. He started giving tips about Engineering entrance exams. He even started sharing the topics he had trouble with.

Within just two months his posts and likes had increased, but now he did not care. He had realized the importance of his work. He had stopped giving importance to things that didn’t matter. He had started studying even harder because he soon wanted to update his status – “Cleared the Engineering Entrance!”
He had understood that this attractive mode of communication came with its own set of responsibilities. Even a small mistake can put life in difficulty.
When the goal is great, we should not bother about little things.

Principal Comment

बच्चों को डिजिटल तकनीक का पूरा ज्ञान हासिल करने के बाद ही इसका इस्तेमाल करना चाहिए। कोई भी तकनीक हो, अगर सही ढंग से प्रयोग में लाई जाए तो राष्ट्र निर्माण में सहायक होती है और गलत प्रयोग हो तो नुकसान हो सकता है। इंटरनेट के माध्यम से बच्चों का ज्ञान भी बढ़ रहा है। अब किसी भी प्रकार की जानकारी बच्चे इंटरनेट के माध्यम से हासिल कर लेते हैं। जबकि कुछ बच्चे इसका गलत इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे वे गलत दिशा की ओर जा रहे हैं। छोटी उम्र में ही बच्चे सोशल मीडिया के साथ जुड़ रहे हैं व सही ज्ञान न होने के कारण इसका प्रयोग सही दिशा में न कर गलत कर रहे हैं। इसके लिए कानून बनाए जाने चाहिए व इस तकनीक का दुरुपयोग करने वालों को सजा का प्रावधान होना चाहिए।

आज के बच्चे धीरे-धीरे संस्कार विहीन होते जा रहे हैं। प्राचीन समय की बात करें तो हमें संस्कार कहां से प्राप्त हुए। जबकि इसकी कोई पाठशाला नहीं थी व न ही कोई ऐसा पाठ्यक्रम हमें उपलब्ध था। दरअसल हम संयुक्त परिवार के सदस्यों से माता-पिता, दादा-दादी, ताया-ताई बुआ, चाचा सब एक ही छत के नीचे कायम थे। संयुक्त परिवार की मर्यादा के साथ छोटे-बड़े का लिहाज भी होता था। प्रत्येक सदस्य का आत्म सम्मान एक महत्वपूर्ण गुण था। सभी सदस्य कमाते थे व मिलकर खाते थे। किसी को कभी यह नहीं लगा कि मेरे भविष्य का क्या होगा। मैं शब्द की जगह हम था। प्रश्न यह है कि संस्कार क्या हैं। बुजुर्गों के पांव छूना और बड़ों का आदर व छोटों से स्नेह संस्कार हैं। हम भूल रहे हैं कि संस्कार कर्तव्य, निष्ठा, मानवता, धैर्य, न्याय, संरचना, ज्ञान, एवं विज्ञान की प्राप्ति भी संस्कार ही हैं। आज की युवा पीढ़ी संस्कारों को लेकर संवेदनशील नहीं है। संस्कार हमें हमारे बुजुर्गों से मिलते हैं। लेकिन आज संयुक्त परिवार कहीं खोने की कगार पर हैं। आज के समय में छोटे परिवार को महत्व दिया जा रहा है। कहते हैं कि छोटा परिवार सुखी परिवार, यह कुछ हद तक सही हो सकता है। युवा पीढ़ी इंटरनेट व मोबाइल पर इतनी व्यस्त हो गई है कि इनको किसी का ध्यान नहीं है। परिवार में किसी के साथ मेल ही नहीं बन पा रहा है। संस्कार क्या होते हैं आजकल के बच्चों से पूछा जाए तो उन्हें मालूम ही नहीं होता और न ही उनकी हरकतों से संस्कार नाम की कोई चीज झलकती है। आज के युग में डिजिटल तकनीक का बढ़ता दायरा समस्त दुनिया में विकास की गाथा लिख रहा है। इंटरनेट आज की मांग है व जरूरत भी, लेकिन तकनीक का प्रयोग किस हद तक सही है इसके बारे में सोचना होगा। संस्कार व तकनीक का सामंजस्य बिठाकर चलेंगे तो कोई भी पीछे नहीं रह सकता। तकनीक के साथ युवा वर्ग संस्कारों को भी न भूले।

सोशल मीडिया एक-दूसरे से जुड़े रहने का आज का मुख्य साधन हो गया है। फेसबुक व व्हट्सएप जैसे साधनों को सही ढंग से उपयोग करेंगे तो ज्ञान में वृद्धि होगी। आज हर कोई इसी पर निर्भर हो गया है। इसी के माध्यम से हम हर जानकारी प्राप्त कर लेते हैं। मगर संस्कारों के बिना कुछ भी नहीं है। हमें ऐसे कदम उठाने चाहिएं जिससे बच्चे इसके साथ सामंजस्य बिठा सकें व तकनीक भी व संस्कार भी एक साथ तालमेल बना सके।

- राजकुमारी, प्रधानाचार्य हिलऑक मॉडल स्कूल डडौर।

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  • अदिति

    छात्रा हिलऑक स्कूल डडौर

    “नेटवर्किंग साइट्स से हो रहा नैतिक मूल्यों का विनाश समाज में बढ़ते सोशल नेटवर्किंग साइट्स के इस्तेमाल से नैतिक मूल्यों का विनाश होता जा रहा है। युवा पीढ़ी पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। इसके नशे ने आज की युवा पीढ़ी को जकड़ रखा है। इससे वे अपनी पढ़ाई एवं नैतिक मूल्यों से दूर होते जा रहे हैं। डिजिटल मीडिया में शिष्टाचार के विकास की आवश्यकता है, ताकि युवा पीढ़ी के जीवन में सकारात्मक सोच विकसित हो सके। इंटरनेट का इस्तेमाल अगर पढ़ाई के लिए करें तो अच्छी बात है, लेकिन होता इसके विपरीत है। युवा पीढ़ी को इसके सही प्रयोग के बारे में सोचना चाहिए, ताकि इसकी सहायता से वे अपना भविष्य संवार सकें व अपने संस्कारों को कभी न भूलें। ”

  • अमन गौतम

    छात्र हिलऑक स्कूल डडौर

    “इंटरनेट की उपयोगिता पहचाननी होगी इंटरनेट का प्रचलन बहुत बढ़ गया है। हर व्यक्ति इसका प्रयोग कर रहा है। इसका सबसे ज्यादा प्रभाव बच्चों पर पड़ रहा है। युवा पीढ़ी का ध्यान अन्य चीजों से हटकर इंटरनेट की ओर ज्यादा हो गया है। अधिकतर युवा इसका प्रयोग गलत जानकारी के लिए करते हैं, लेकिन अगर इस सुविधा का सही इस्तेमाल करें तो हमारी ज्ञानशैली को बढ़ावा मिलेगा। यहां तक कि इंटरनेट पर पढ़ाई से संबंधित हर मुश्किल को हल किया जा सकता है। हमें इसका गलत उपयोग न करके इसकी उपयोगिता को पहचानना चाहिए। ”

  • दीक्षांत

    छात्र हिलऑक स्कूल डडौर

    “डिजिटल मीडिया के गलत प्रयोग से आ रही नकारात्मकता सोशल साइट्स के नकारात्मक प्रभाव से बचने के लिए आध्यात्मिक, संस्कारिक समूहों व संस्थाओं से जुड़ी सोशल साइट्स पर ऐसे बहुत से समूह व संस्थाएं हैं, जोकि सकारात्मक विचारों का आदान-प्रदान करते हैं। बस हमें जरूरत है तो इनसे जुडऩे की, जिससे हमारा मानसिक विकास तो होगा ही हम अंदर से मजबूत भी बनेंगे। आज की युवा पीढ़ी डिजिटल मीडिया का गलत प्रयोग करने से नकारात्मकता की चपेट में आ रही है। हमारे संस्कार यह नहीं कहते कि हम किसी भी वस्तु का गलत इस्तेमाल करें। संस्कार हमें सकारात्मकता प्रदान करते हैं, जिससे व्यक्ति का विकास होता है। ”

  • अनीता वालिया

    छात्र हिलऑक स्कूल डडौर

    “सकारात्मक विषयों पर हो डिजिटल मीडिया का इस्तेमाल 21वीं सदी में चारों ओर विकास की बात होती है और यह सही भी है, क्योंकि वर्तमान समय में इंटरनेट की सुविधा से विश्व का कोना-कोना एक-दूसरे से जुड़ चुका है। आज डिजिटल एवं ऑनलाइन सुविधा वरदान सिद्ध हो रही है। अगर युवा इसका सही ढंग से प्रयोग करें तो इंटरनेट के कारण हर देश आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक दृष्टिकोण से प्रगति कर सकते हैं और कर भी रहे हैं। लेकिन यह तभी संभव हो सकता है जब डिजिटल मीडिया का प्रयोग शिष्ट भाषा व चित्रों, शिष्ट विचारों के साथ हो। डिजिटल एवं ऑनलाइन सूचनाओं में अश्लीलता व अभ्रदता सहित समाज में बुरा प्रभाव डालने वाली सूचनाओं के आदान-प्रदान पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगना चाहिए व कोई इस प्रकार की ओछी हरकत करता है तो उसे कड़ी सजा का प्रावधान होना चाहिए। संस्कार व नैतिक मूल्य हमारी संस्कृति व सभ्यता की पहचान हैं। इसलिए डिजिटल एवं संचार व्यवस्था में संस्कारों तथा नैतिक मूल्यों से जुड़ी ज्ञानवद्र्धक व नई खोज से जुड़ी सूचनाओं तथा जानकारियों का ही समावेश हो। संस्कारों व नैतिक मूल्यों के बिना मनुष्य पशु के समान है। नैतिक मूल्य हमारे जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। इससे हमारे अंदर सकारात्मक सोच विकसित होती है। डिजिटल सुविधा का प्रयोग संस्कारों के साथ किया जाए तो उचित है। ”

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