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Virtue of Services : Diamond

सबके प्रति सेवा-भाव : हीर

कानपुर के अर्मापुर मोहल्ले में यह किसी चमत्कार से कम नहीं था. यक –ब- यक जैसे उसके जीवन के पिछले पन्ने कहीं गुम हो गए. मोहल्ले में तो एक किस्म का उन्मादी उत्साह व्याप गया था. ढोल – मजीरे बज रहे थे और लोग झूम-झूमकर नाच रहे थे. जैसे ही दूरदर्शन पर खबर आई कि नेशनल लेबल पर सीनियर बॉयज केटगरी के अपने ईवेंट शॉट पुट थ्रो में संजय ने न केवल प्रथम स्थान प्राप्त किया है बल्कि उसने पिछले रिकॉर्ड को भी तोड़ दिया है तो जैसे मोहल्ले में संजय के इतिहास का खंडहर और उसका सब कुछ एकबारगी ध्वस्त हो गया.

तीन महीने पहले ही तो संजय ने यू पी एथलेटिक मीट में भी पहला स्थान न केवल शॉट पुट में पाया था बल्कि जेवलिन थ्रो में भी उसे पहला स्थान मिला था लेकिन यह खबर केवल अखबार में छपी. रेडियो और टीवी पर नहीं आई थी तो लोग सुन नहीं पाए थे. मगर इस बार तो यह खबर आकाशवाणी और टीवी पर भी आ गई.

यह खबर सबसे पहले अख़लाक़ भाई ने रेडियो पर आकाशवाणी से प्रसारित होने वाले समाचारों में रात को नौ बजे सुनी लेकिन वे रहते थे तीन किलोमीटर दूर और उनकी उम्र थी कोई साठ-बासठ साल. उनके पास फ़ोन भी नहीं था कि उसी से संजय के पिता ठाकुर श्रीभान सिंह को बधाई देते. अक्टूबर की अन्हरिया रात में सायकिल से तीन किलोमीटर जा पाना उनके बूते से बाहर था.

बिचारे ! मन मसोसकर रह गए वरना सबसे पहले वही पहुँचते और ठाकुर साहब के सामने उनके बेटे संजय की तारीफ़ में वह सब भी कह डालते जो किसी ने न कभी सुना और न ही देखा था. ऐसा करके अख़लाक़ मियाँ कुछ अन्याय नहीं करते. बात ही तारीफ़ करने की थी और अगर तारीफ़ कर देने से ठाकुर साहब की नज़र उनके बेटे रिजवान की ओर थोडा घूम जाती तो उसे एक सरकारी नौकरी मिल जाती. ठाकुर साहब नेता थे. सरकारी कारखाने में उनकी बहुत चलती थी. छोटे अफ़सर अपने बड़े अफ़सर की बात माने न माने लेकिन बड़ा अफ़सर भी ठाकुर साहब की सिफारिश नहीं टाल सकता था. उसकी हिम्मत ही नहीं होती थी कि वह उस नेता से पंगा ले जिसका कर्मचारियों में बड़ा जनाधार है. तो , अख़लाक़ मियां तो मन मसोसकर रह गए लेकिन मोहल्ले वाले कहाँ पीछे रहने वाले थे. उन्होंने पहले तो तांता बनाया ठाकुर साहब को बधाई देने का और फिर उसके बाद मन बनाया कि इस घटना को उत्सव बना दिया जाए और अपने व्यवहार से ठाकुर साहब को खुश करके उनका दिल जीत लिया जाए जो कि बहुत आसान नहीं था क्योंकि मोहल्ले और उसके पास के अन्य मोहल्ले के लोगों ने अपने अनुभवों के आधार पर संजय को लेकर उनका दिल खट्टा कर दिया था.

संजय बचपन से ही खिलंदड़ा था. स्कूल में भी पी टी पीरियड के पहले और बाद में भी वह अपनी कक्षाओं से गायब रहता. ऐसा कोई दिन नहीं था जब उसके नाम पर मॉनिटर शिकायत की सूची बनाकर क्लास टीचर को न थमा देता. इतना ही नहीं मोहल्ले में भी जो सार्वजनिक मैदान था उसमें भी क्रिकेट खेलते हुए उसकी शिकायतों का पुलिंदा हर हफ्ते बंध जाता. स्कूल से घर पहुँचते ही वह कंधे पर टंगा या कि लदा बैग वह उतार फेंकता और सीधे मैदान में दाख़िल. और उसके वहां पहुँचते ही क्रिकेट शुरू हो जाता. रोज-रोज की शिकायतों से ठाकुर श्रीभान सिंह भी ऊब गए थे.

खेल-कूद में उसका दिल ऐसा रमा था कि शिकायतों और हिदायतों का उसपर कोई असर नहीं था. हार-थककर ठाकुर श्रीभान सिंह ने भी संजय को डांटना-बोलना छोड़ दिया. आये दिन उसके लगाए शॉट से किसी को चोट लगती तो किसी के खिड़की के शीशे टूटते.

बारह – तेरह का होते ही उसका क़द निकलने लगा था. अपने हम उम्र लड़कों से उसकी ऊंचाई छह इंच से ज्यादा हो गई थी. सहपाठी उसे लमघोड़ा कहने लगे थे मगर उसपर इन सब फ़ब्तियों का कोई असर नहीं था. खेल और केवल खेल उसके जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया था. डांट या ताने और उलाहने को उसने सुनना ही बंद कर दिया था. सीधे शब्दों में घर-परिवार और मोहल्ले की नज़रों में वह बहेल्ला बन गया था. लेकिन दसवीं कक्षा तक आते-आते उसमें अजीबोगरीब परिवर्तन हुआ. उसका निकलता क़द छह फुटा हो रहा था. और, तब वह मोहल्ले के मैदान से दूर क़स्बे के मैदान में निकल आया. उसके साथ मोहल्ले के दो-तीन लड़के और हो गए. शाम साढ़े चार और पांच के बीच वहां पहुँचता. व्यायाम करता. डिस्कस, जेवलीन और शॉट पुट फेंकता. जब कंधे उखड़ जाने को होते तो वह घर लौटता. मोहल्ला भी उसकी अनुपस्थिति से कुछ शांत हो चला था कि अब उनके पास शिकायतें न के बराबर बची थीं.

संजय ने दसवीं की परीक्षा पास की और जैसा कि पढ़ाई में उसकी अरुचि थी, उसे तीसरे दर्जे से ही संतोष करना पड़ा. इसकी न चर्चा होनी थी न हुई. लेकिन उन्हीं दिनों जिला स्तर के खेल कूद हुए और उसमें उसने स्वतंत्र रूप से भाग लिया. कोई सफलता उसे अपने किसी भी इवेंट में नहीं मिली मगर उसमें जो जज्बा था वह अपने को असफल मानने से इनकार करता रहा. उसने घनघोर मेहनत की और अगले साल जिला स्तर को बिना कोई महत्त्व देते हुए उसने सीधे यू पी ओपन एथिलेटिक मीट में हिस्सा लिया और शॉट पुट के साथ-साथ जेवलिन थ्रो में रिकॉर्ड बनाया. इसी के आधार पर उसका राष्ट्रीय खेलों के लिए यू पी की टीम में चयन हुआ था मगर इसकी कोई चर्चा दूर-दूर तक नहीं थी.
लेकिन कौन जानता था कि एक दिन सन्नाटे में नगाड़ा बजने लगेगा. नेशनल मीट हैदराबाद में थी. संजय उसमें भाग लेने कब गया इसे मोहल्ले में कोई नहीं जानता था. लोग तो आज जाने जब उसने शॉट पुट में पिछला रिकॉर्ड तोड़ दिया है. रेडियो और टीवी पर खबर आई है.
कुछ लोग कह रहे हैं – “हम तो जानते थे कि लड़के में जान है.”
कुछ लोग कह रहे हैं- “संजय हीरा है ...हीरा ...”
अभी तो संजय का जेवलिन इवेंट बाक़ी है. जब वह वापस आएगा तो कानपुर रेलवे स्टेशन पर पूरा मोहल्ला डी जे के साथ खड़ा होगा.

This wasn’t less than a miracle in Kanpur’s Armapur village. All of a sudden the past pages of his life had disappeared. The village was filled with a strange enthusiasm. People were celebrating wildly with drums and dances. As soon as the news came on Doordarshan that Sanjay has not only stood first in the National Level “Shot Put Throw” in the senior boys category but has also broken all previous records, the ruins of Sanjay’s history in the village and his previous reputation were instantly demolished. Three months ago, Sanjay had stood first during the UP Athletic Meet in not only Shot Put but also in Javelin Throw. But this news was published only in the local papers and had not been broadcasted on radio or Television so not many people could hear it. But this time, Sanjay was on Radio as well as Television.

Akhlakh Bhai was the first to hear this news on the Nine o’clock news broadcasted thorough Akashvani, but since he was almost seventy years old and lived three kilometers away, he could not tell anyone. He did not even own a phone with which he could call Sanjay’s father – Thakur Shreebhan Singh and congratulate him. He could not travel three kilometers by cycle in the cold October night.

Poor man! He could not do anything, otherwise he’d have been the first to reach and tell Thakur Sahab all about his son’s achievements - even those things that no one had ever heard or seen. He would not be doing anything wrong if he did this. It was a matter of great pride and if his praises could bring Thakur Sahab’s attention towards his son Rizwan, then he too would have bagged a government job. Thakur Sahab was a politician. He had a lot of clout in the government offices. A junior office may ignore the wishes of his senior office but not even a senior officer could ignore Thakur Sahab’s commendation. No one dared mess with the leader who had such a huge following among the workers. So, although Akhlakh Miya could not do anything, the other villagers were not to be left behind. First, they made a procession to Thakur Sahab’s house to congratulate him and later they decided that there should be a proper celebration. They wanted to win Thakur Sahab’s heart, which wasn’t easy because several people from the village and the surrounding areas had filled his ears with Sanjay’s complaints earlier. Sanjay had been passionate about sports since childhood. In school he was always missing before P.T. Period and from his classes. Not even a single day passed when the monitor did not hand over a list of his transgressions to the Class teacher. Not only this, there were a host of complaints every week about him playing cricket in the village’s public ground. As soon as he reached home from school, he would throw away the bag hanging from his shoulder and run to the ground. As soon as he reached there, cricket would start. Thakur Shreebhan Singh too was fed with daily complaints.

He as so obsessed with sports that complaints and warnings did not affect him. Tired and hopeless, even Thakur Shreebhan Singh had stopped scolding him. Every day, his shots would hurt someone or break someone’s windows glass.
His height suddenly shot up when he was around twelve. He was almost six inches taller than other boys his age. Classmates had started calling him Beanpole but he was not bothered by their teasing. His life revolved around sports. He had stopped paying attention to admonishments, comments or taunts. In short, he had become thick skinned according to his family and the villagers.
But when he reached 10th standard, he went through a strange transformation. His height had almost reached six feet. And then, he left the village ground behind for the wider playing ground of the town along with two or three other boys from the village. He used to reach there around four-thirty or five in the evening. He would exercise and then practice with discus, javelin and shot put. He would return home only when his shoulders were ready to drop. The village too had calmed down in his absence as now they had almost no complaints left.
Sanjay cleared class 10th exams. And as was expected with his lack of interest in studies, he had to satisfy himself with third division. This wasn’t a surprise to anyone.

But at around the same time, District level games were held and he participated independently in them. He was not successful in any of his events but he did not give up and accept defeat. He worked hard and next year he directly went for the UP Athletic meet. There, he set records for both Shot Put and Javelin throw. Based on his performance, he was selected for the national level games as a part of U.P. Team but even then his achievements were not known. But who could have predicted that one day trumpets of his excellence would break the silence. The national meet was in Hyderabad. No one knew when Sanjay left to participate in the meet. People came to know today when he broke the old records in Shot Put and the news came on radio and TV. Some people are saying – “We always knew the boy had talent” Some are saying, “ He is a diamond…a Diamond, I say..”

Sanjay’s Javelin event has still not been held. When he returns, the entire village would be there to receive him at Kanpur Railway Station.

Principal Comment

विद्याथर्ियों में सेवा का सदाचार सबसे पहला संस्कार देना चाहिए। सेवा की न केवल समाज में मनावता भाव जगाएगी बल्िक बच्चे के व्यिक्ति को भी बेहतर बनाएगी। सेवा भावना रखने वाले इंसान का व्यकित्व सकारात्मक दिशा में विकसित होता है और समाज व देश सेवा के साथ साथ इंसान का चरित्र निर्माण भी होता है। प्रकृति ने मानव को सोचने समझने की शक्ति के साथ साथ दया, प्रेम व करुणा जैसी संवेदनशील भावनाएं भी दी हैं। यह भावनाएं ही मानव में सेवा भावना का संचार करती हैं। यूं तो मूलत: मनुष्य व पशु में कोई भेद नहीं है। खाना पीना व सोना दोनों के जीवन की प्राथमिकताएं हैं परंतु भूखे प्यासे होने पर भी दूसरों को अपना भोजन बांटना मनुष्य को पशुत्व से ऊपर उठाता है। इस धरती पर जन्म मृत्यु का चक्र तो सामान्य रूप से चलता ही रहता है लेकिन मरकर भी जो अमर रहते हैं उनमें एक भावना समान रूप से रहती है और वह है सेवा की भावना। कवियों ने भी समय समय पर इस गुण के बारे में लिखा है। उन्होंने भी जागरूकता फैलाने की कोशिश की है। इतिहास गवाह है कि मानव जीवन की सार्थकता परोपकार में ही है। अपना सुख चैन विस्मृत कर न जाने कितने देश भक्त भावी पीढ़ी की आजादी के लिए मातृ भूमि के लिए कुर्बान हो गए। स्वार्थ से उठकर ही मानव कल्याण कर सकता है। इस गुण को बच्चों में डालना बेहद आवश्यक है। इस गुण के संचार का पहला दायित्व अभिभावकों का होता है। बच्चों में नैतिक शिक्षा का संचार करना चाहिए। छोटे बच्चे कच्चे घड़े के समान होते हैं, उसे जैसा चाहे वैसा आकार दिया जा सकता है व वैसा ही आचरण सिखाया जा सकता है। अगर बचपन से ही बच्चों में सेवा भाव, समय का सदउपयोग व सत्संगति जैसे भावों का संचार किया जाए तो बच्चे में व्यवहारिकता जैसे गुणों का समावेश किया जा सकता है। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि संपूर्ण मानवता सेवा की भावना पर ही टिकी है। जहां स्वार्थ है वहां दुख है, कष्ट है और जहां परमार्थ है वहां सुख-शांति और समृद्धि है। बच्चों को स्कूलों में इन गुणों के संचार के लिए शिक्षकों को भी काम करना चाहिए। विभिन्न कार्यशालाओं का आयोजन करवा उन्हें नैतिक मूल्यों की शिक्षा देना चाहिए। विद्यार्थियों को रोचक कथाएं व इतिहास के अंश को सुनाकर उनमें इस गुण का संचार किया जा सकता है। आधुनिक जीवन शैली में बच्चों के लिए अभिभावकों के पास भी समय नहीं होता ऐसे में बच्चा अकेलापन महसूस करता है।

ऐसे में परोपकार को अपने व्यक्तित्व का अंग बनाने वाले व्यक्ति को असफलता व निराशा जैसी चीजें कभी परेशान नहीं कर सकेंगी। जिसमें परोपकार के भाव आ गए वह फिर कई गुणों को सीख लेता है। उसमें सहनशीलता, गंभीरता, सच्चाई व सच्ची लगन आ जाती है। और जिस व्यक्ति में यह गुण हैं वह अपने आप ही मंजिल तक पहुंच सकता है। सेवा के गुण से व्यक्ति का जीवन महक जाता है। बच्चों को चाहिए कि वे अपने लिए नहीं बल्कि सब के लिए सोचें। जितना हो सके लोगों का सहयोग करें। जरूरत पड़े तो अपना सुख चैन त्याग कर भी दूसरों की जिंदगी में सुकून व आराम भरें। बच्चों को सिखाया जाना चाहिए कि कितने ही ऐसे लोग हैं जिन्हें सहयोग मिल जाए तो उनकी जिंदगी संवर सकती है।

देवेंद्र कुमार, प्राचार्य केंद्रीय विद्यालय

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    “हमें बडों की सेवा करनी चाहिए। दोस्तों को जरूरत पड़े तो सहयोग करना चाहिए। अगर हमारी थोड़ी से मदद से दूसरे का काम बन जाता है तो हमें वह जरूर करना चाहिए। बड़ों की सेवा व समाज के जरूरतमंद लोगों की सेवा करना अच्छा होता है।”

  • श्रुति

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    “सेवा का मतलब सहयोग करना होता है। हम म मी पापा के साथ जाते हैं और लोगों को जरूरत की चीजें देते हैं। ऐसे में उन लोगों की जरूरतें पूरी हो जाती है और मुझे खुशी मिलती है।”

  • शिवानी

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    “स्कूलों में भी सिखाया जाता है और घर पर भी कि लोगों की सेवा करें। मैं लोगों की मदद करती हूं। अपने दोस्तों की भी करती हूं और मेरे दोस्त जरूरत पड़ने पर मेरी हेल्प करते हैं। इसी तरह बड़ों व जरूरतमंदों की सेवा करनी चाहिए।”

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  • कविता

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    ”बच्चों में बचपन से ही सेवा भावना विकसित हो, इस ओर ध्यान देना चाहिए। जो बातें बचपन में बताई जाती हैं वे हमेशा याद रहती हैं। अभिभावक से लेकर शिक्षक को इस विषय पर ध्यान देना चाहिए। जिस बच्चे में संस्कार है वही अपनी संस्कृति का समझ सकता है। उसी में राष्ट्रीयता की भावना कूट-कूटकर भर सकती है। ”

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    ”टीवी संस्कृति की वजह से भारतीय संस्कृति पर काफी प्रभाव पड़ रहा है। ऐसी स्थिति में संस्कार विषय पर जोर देना आवश्यक है। जिन बच्चों में संस्कार नहीं है वे किसी दूसरे की अहमियत नहीं समझ सकते। वे राष्ट्रीय मूल्यों की परवाह नहीं करते। आज के समय में सबसे अधिक संस्कार जागरण पर ही जोर देना होगा।”

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