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Virtue of services : Angel

सबके प्रति सेवा-भाव : फरिश्ता

रुस्तम विला बहुत बड़ा था. विला के मालिक ने उसमें आठ फ्लैट बनाए थे. विला की साफ़-सफाई का वह बहुत ध्यान रखता था. लॉन भी खूब हरा-भरा और इतना बड़ा था कि उसमें विला के बच्चों के लिए खेलने-कूदने जगह काफी थी. विला के आगे सड़क थी और सड़क की दूसरी तरफ बड़ा-सा मैदान था जो गर्मियों में मटमैला और वर्षा के मौसम में हरा हो जाता था.

आस-पास के विला में रहने वालों के लिए यह मैदान कार पार्किंग की अतिरिक्त सुविधा बना हुआ था. इस मोहल्ले, जिसका नाम आनंद नगर है, के पास ही दो अच्छे स्कूल और तीन-चार अच्छी सुविधाओं वाले मेडिकल सेंटर भी थे जिनकी आवश्यकता लोगों को आये दिन हुआ करती थी. यही कुछ खास विशेषताएं थीं जिनके कारण रुस्तम विला और पास के कुछ अन्य विला के निवासी लगभग स्थाई रूप से बस गए थे. वर्षों से इसी चौहद्दी में रहते हुए इन परिवारों में अपनापे का एक मीठा रिश्ता पनप गया था. एक-दूसरे को सभी करीब-से जानते थे और मौके-कुमौके उन सबकी मुलाकात भी होती रहती थी. इसी रुस्तम विला में अजय और शाहिद भी रहते थे. दोनों के घरों की दीवार मिली हुई थी. अजय और शाहिद कद-काठी में भी समान दिखते थे. विला में जो दूसरे परिवार थे उनके भी बच्चे थे. उनसे भी शाहिद और अजय की मित्रता थी लेकिन इन दोनों की मित्रता आपस में कुछ अधिक ही थी. दोनों चौथी जमात में पढ़ते थे. स्कूल घर के पास था. साथ जाते और साथ ही वापस आते. अजय माता – पिता की अकेली संतान था जबकि शाहिद की एक छोटी बहन भी थी. चार साल की. आयशा. इस साल रिजल्ट आने के बाद वह ग्रेड वन में जब आ जायेगी तो फिर अपने भाई शाहिद के साथ ही स्कूल जायेगी. यानी कि तीनों साथ जायेंगे. अभी वह इनसे एक घंटा बाद जाती है और एक घंटा पहले आती है. जूनियर–सीनियर के जी के छोटे बच्चों की अवस्था को ध्यान में रखते हुए उनके स्कूल के समय को कम किया गया है. ये तीनों जब साथ होते हैं तो लगता ही नहीं कि दो अलग-अलग परिवारों के बच्चे हैं. आयशा भी तो अजय को भाई कहते नहीं थकती. अजय के पिता मेडिकल रिप्रजेंटेटिव हैं और उसकी मां एक अस्पताल में नर्स का काम करती हैं. दोनों के काम ऐसे हैं जिनमें उन्हें मानसिक और शारीरिक थकान हो जाती है. उसके पापा को तो कभी–कभी दो-दो , तीन-तीन दिन शहर से बाहर रहना होता है. नर्स का काम भी कहाँ आरामदेह होता है. बस एक सुविधा है कि अस्पताल ने अजय की मम्मी को दिन की सामान्य शिफ्ट में ड्यूटी दे रखी है ताकि वह परिवार और विशेष रूप से अपने बच्चे की देखभाल के लिए पूरा समय पा सके.

शाहिद के अब्बा का अपना व्यवसाय है और उसकी अम्मीं कहीं नौकरी नहीं करतीं. घर की साज-संभाल का काम ही कहां कम है. दिन भर पूरे फ्लैट में चक्करघिन्नी की तरह घूमती ही तो रहती हैं. शाहिद कभी–कभी उनसे पूछता भी है, “ अम्मीं, घर का काम करते-करते तुम कितना थक जाती हो. बार-बार कहती भी हो, आयम टायर्ड ऑफ़ आल दिस ... सोचो , अजय की मम्मी का ... वह तो हॉस्पिटल भी जाती हैं ...” “ हां , जानती हूँ बेटे. उनका जिगरा ही ऐसा है ... सभी लोग उनके जैसे नहीं हो सकते .” “क्यों अम्मीं ? सब लोग उनके जैसे क्यों नहीं हो सकते?”

“बेटा, अल्ला मियां सबको एक-सा नहीं बनाते न ! वे फ़रिश्ते भी तो बनाते हैं ... अजय की मम्मी भी फरिश्ता हैं .” कहते-कहते शाहिद की अम्मीं ने अपना दाहिना हाथ बाएं कंधे के नीचे रखकर एक दबाव बनाया. उनके चेहरे पर एक दर्द उभर आया था. शाहिद ने पूछा भी , “क्या हुआ अम्मीं ?” “कुछ नहीं बेटे , यहाँ थोडा-थोडा दर्द होता है.” “क्यों होता है दर्द?” “पता नहीं बेटे ...” शाहिद ने अम्मीं के चेहरे पर देखा. उसे लगा कि उसकी अम्मीं भी फ़रिश्ता हैं. उससे कम नहीं. अगले दिन स्कूल जाते हुए शाहिद ने अजय से कहा , “ तुम्हारी मम्मी फरिश्ता हैं.” “फ़रिश्ता क्या होता है ?” “मुझे नहीं मालूम. मेरी अम्मीं कहती हैं ...आजकल मेरी अम्मीं को ‘यहाँ’ बहुत दर्द होता है.” उसने हाथों से बाएं कंधे के नीचे की जगह पर अपना हाथ रखा. शाम को जब अजय की ममी अस्पताल से घर आईं तो अजय उनके पीछे ही पड़ गया , “ ममी, शाहिद की अम्मीं को देख लो न ! उन्हें बहुत दर्द होता है ...” “क्या हुआ तुम्हारी आंटी को ? उनसे कहो अस्पताल आ जाएँ ...” “नहीं , तुम अभी चलो न ... आंटी को देख लो ... आंटी कहती हैं कि तुम फरिश्ता हो ...मम्मी, फरिश्ता क्या होता है ?” “मुझे नहीं मालूम. चलो तुम्हारी आंटी को देखते हैं ...”

अजय अपनी मम्मी का हाथ पकड़े शाहिद के फ्लैट में दाखिल हुआ. अजय की मम्मी ने शाहिद की अम्मीं को अस्पताल में अपनी पूरी जांच कराने के लिए कहा है. शाहिद की अम्मीं बार-बार ना-नुकर करती रहीं- “ कुछ नहीं है, ज़रा–सा दर्द है उसके लिए पूरी जांच कराना क्यों?” लेकिन अजय की मम्मी ने उन्हें समझा लिया है और वह उनकी बात मान भी गयी हैं. कल अस्पताल जायेंगी शाहिद की अम्मीं .

अस्पताल में कई तरह की जांच हुई है. शाहिद की अम्मीं को भर्ती कर लिया गया है. जांच में पता चला है कि उनके हृदय का एक वॉल्व बदलना जरूरी है. कई दिन अस्पताल में रहना होगा. अजय को भी पता चल गया है. वह मम्मी के सामने खड़ा है, “ मम्मी , तुम फ़रिश्ता हो न ! शाहिद और आयशा का टिफिन भी बना दोगी?” अजय की मम्मी अपने बेटे को देख रही है और सोच रही है कि यह भी तो फरिश्ता ही है.

Rustom Villa was huge. The owner of the Villa had built eight flats in it. He was very particular about the cleanliness of the Villa. The lawn was green and big enough that all children from the Villa could play there. There was a road in front of the Villa and on the other side of the road, there was a huge ground which used to turn muddy in summers and green during monsoons.

For the people living in the surrounding villas, this ground doubled up as a parking area. This society, which is called Anand Nagar, is located near two good schools and three-four medical centres with good facilities which were needed by the people every few days. These were some of the reasons why the residents of Rustom Villa and some other nearby Villas had permanently settled there. Since these families had been living in the same neighborhood for years, they had formed a bond and knew each other intimately and would meet each other during some festival or event. Ajay and Shahid lived in the Rustom Villa. The walls of their houses were adjacent. Ajay and Shahid were almost similar in height and looks. Other families in the Villa too had children. They too were Shahid and Ajay’s friends but Shahid and Ajay were best friends. Both were in the fourth standard. School was near their house so they would go to the school together and come back together. Ajay was an only child while Shahid had a four year old younger sister- Ayesha. This year after school results are declared, she would get admitted to Class one and then she too would go to school with Shahid. All three will go together. Now she goes one hour after them and comes home an hour earlier. Since the kids of Junior and senior K.G. are too young, their school timings are shorter. When the three of them are together, it doesn’t seem as if they are from different families. Ayesha considers Ajay her brother and calls him Bhai.

Ajay’s father is a Medical Representative and his mother is a nurse in a hospital. Both jobs are very physically and mentally tiring. His father has to stay out of the city for even two or three days sometimes. And the job of a nurse is never easy or comfortable. They only have one bright spot. The hospital has given Ajay’s mother a day shift so that she can take care of her kid and family.

Shahid’s Abba has his own business and his Ammi does not work. Looking after the house is not any less demanding. She roams the flat the entire day like a fox. Sometimes Shahid asks her, “Ammi you get so tired doing household work all day. You say too – I am tired of all this. Think about Ajay’s mummy …she has to go to the hospital too…”

“I know son. She is very brave but everyone cannot be like her.”

“Why Ammi? Why can’t everyone be like her?”

“Son, Allah does not make everyone similar. He makes angels too…Ajay’s mother is an Angel.” saying this, Shahid’s Ammi put her right hand under the left shoulder and pushed. Her face clouded with pain. Shahid asked, “What’s wrong Ammi?”

“Nothing son, this hurts a little.”

“Why does it hurt?”

“I don’t know dear….”

Shahid looked at his mother. He though that his Ammi too is an angel.

“What is an Angel?”

“I don’t know. Ammi says that. These days Ammi has pain here.” He pointed towards the place below his left shoulder.

In the evening when Ajay’s mummy returned from the hospital, Ajay insisted, “Mummy please see Shahid’s Ammi. She is in a lot of pain…”

“What happened to your aunty? Tell her to come to the hospital….”

“No, let’s go now…look at her…aunty says you are an angel…mummy what is an Angel?”

“I don’t know. Ok, let’s go and see your aunty.”

Ajay clutched his mother’s hand and entered Shahid’s flat. Ajay’s mother asked Shahid’s Ammi to get a full checkup done in the hospital.

Shahid’s Ammi kept refusing – “It’s nothing… just a little pain, why get a full check up for that?: But Ajay’s mother convinced her and she has agreed. Shahid’s Ammi will go to the hospital tomorrow.

Several tests were done in the hospital. Shahid’s Ammi has been admitted. It has been found in the test that it is important to change a valve in her heart. She would have to stay in the hospital for many days. Ajay too has found out. He is standing in front of his mother, “Mummy, you are Angel! Will you make Shahid and Ayesha’s tiffin too?”Ajay’s mother is looking at her son and thinking that he too is an Angel.

Principal Comment

सबके प्रति सेवा भाव, हंसमुख प्रसून सिखलाते। पलभर हैं जो हंस पाओ, अपने उर की सौरभ से, जग का आंगन भर जाओ। सेवा भाव को लेकर कवि सुमित्रानंदन पंत ने यह पक्तियां बहुत ही सुंदर लिखी हैं। सेवा एक महान भाव है जिसे निस्वार्थ रूप से किया जाना चाहिए। भारत विभिन्न धर्मों का देश है और सभी धर्मों में किसी जरूरतमंद या असहाय की सेवा को सर्वोपरि माना है। तुलसीदास का दोहा, परहित सरिस धरम नहीं भाई भी दूसरों की सेवा करने की संदेश देता है। उन्होंने इस दोहे के माध्यम से कहा है कि दूसरों की सेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं है। सेवा भाव से युक्त मनुष्य, मनुष्य नहीं रह जाता बल्कि दीनद यालु होकर दिव्य सुख का अनुभव करता है।हमें कोई भी कार्य करने से पहले अच्छी तरह विचार कर लेना चाहिए कि उस कार्य का दूसरों पर क्या प्रभाव पड़ेगा। कहीं आपका कार्य उन्हें किसी तरह की क्षति तो नहीं पहुंचाएगा? हमें अपने जीवन को इस तरह जीना चाहिए, जिससे लोगों को अधिक से अधिक लाभ पहुंचे। एक दूसरे के कष्ट और दुख को समझकर उसे दूर करने का प्रयास करना चाहिए। भारतवर्ष ऐसे अनेक महान लोगों के उदाहरण से भरा पड़ा है जिन्होंने लोगों के हित में अपने प्राण तक न्यौछावर कर दिए। महर्षि दधिचि, महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद, राजा राममोहन राय, मदर टेरेसा आदि ने हमेशा अपने सुख से ज्यादा दूसरों के सुख की चिंता की। वर्तमान में आध्यात्मिक सुखों का स्थान भौतिक सुखों ने ले लिया है। आज व्यक्ति स्वार्थ व लालच में फंसकर अपने हित में अधिक सोचता है। उसे यह अहसास नहीं होता कि उसके हित के कारण कई लोगों का अहित भी हो रहा है। वह अपनी वास्तविक इच्छाओं का गला घोंट काल्पनिक इच्छाओं की पूर्ति में लगा है। वर्तमान में मनुष्य ऐसे कार्य कर रहा है, जिससे मनुष्यता का कभी हित नहीं हो सकता। इसी कारण मानवता समाप्त सी हो गई है। हमें इसी खत्म होती मानवता को बचाना है। इसके लिए जीवन में प्रेम, करुणा, उदारता आदि सद्गुणों का विकास जरूरी है। इन गुणों से युक्त व्यक्ति ही दूसरों की सेवा करने के लिए तत्पर हो सकता है। हमें सेवा कार्य करते समय अहंकार की भावना मन में नहीं रखनी चाहिए, क्योंकि निस्वार्थ सेवा से ही अलौकिक आनंद और संतोष मिलता है। जिस प्रकार संपूर्ण प्रकृति हवा, सूर्य, बादल, पेड़, नदी, चांद आदि स्वयं के लिए नहीं, बल्कि प्राणीमात्र के लिए समर्पित हैं, ठीक वैसे ही गरीब, असहाय, लाचार, बेसहारा लोगों के दुखों को दूर करने के लिए हमें तत्पर रहना होगा। निस्वार्थ सेवा भाव ही मनुष्य को पशु श्रेणी से भिन्न करता है। भारतीय संस्कृति मानव मात्र के कल्याण की भावना से ओत-प्रोत है। मानव जीवन की सार्थकता इसी में है कि वह दूसरों के कल्याण के विषय में सोचे। निस्वार्थ सेवा ईश्वर प्रदत्त कार्य है जिसे हमें यश प्राप्त करने या अहसान करने की वना से नहीं करना चाहिए। अगर हमें इस तरह की सेवा करने का मौका मिलता है तो हमें खुद को धन्य मानना चाहिए। सोचना चाहिए कि ईश्वर ने पर सेवा, पर उपकार करने के लिए आपको चुना है और ऐसा अवसर हमें नहीं खोना चाहिए। सेवा भाव का न तो सीमित क्षेत्र है और न ही निर्धारित समय। जीवन में हर पल, हर अवसर, हर स्थान पर सेवा के द्वार खुले हैं, उन अवसरों व उन पलों का लाभ उठाने की प्रवृत्ति हमारे भीतर कूट-कूट कर भरी होनी चाहिए।आज यह सोचने की जरूरत है कि हमारे किस कार्य से समाज और दूसरे लोगों को लाभ मिलेगा। लेकिन हकीकत में हो इसका उल्टा रहा है। लोगों की सारी ऊर्जा यह सोचने में व्यर्थ हो रही है कि किस तरह दूसरे का नुकसान हो। दुर्भाग्य की बात ये है कि यह दुर्गण बच्चों में बड़ों की प्रवृत्ति देखदेखकर ही आ रहा है। बच्चों को इस प्रवृत्ति का वाहक नहीं बनना है। हमें अपने कार्य समाज और दूसरों के प्रति ही समर्पित रखने हैं। सेवा भाव अगर जागृत होगा तो मन सदैव प्रसन्न रहेगा। शिक्षकों का यह कर्तव्य है कि बच्चों में सेवा भाव के गुण को जागृत करें और उन्हें इस बात के लिए प्रोत्साहित करें। अच्छा शिक्षक वास्तव में वही है। हमें देखना होगा कि अगर कोई बच्चा दूसरे की सेवा करके आता है तो उसके कार्य को सभी के सामने उजागर करें और उसे अहसास दिलाएं कि उसने बहुत बेहतर कार्य किया है और इस तरह के कार्य को वह भी आगे जारी रखे और उसकी देखा-देखी अन्य बच्चे भी अच्छे कार्य करें। प्रख्यात कवि जयशंकर प्रसाद की पंक्तियां इसी ओर इशारा करती हैं-
औरों को हंसते देखो मनु,
हंसो और सुख पाओ
अपने सुख को विस्तृत कर लो
सबको सुखी बनाओ।
Mrs. Rubila Khanam Principal Colonel’s Bright Land Public School

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Testimonial
  • निधि शर्मा, कक्षा-ग्यारह, विज्ञान।

    “सेवा भाव हमें बचपन से ही सीखने को मिलता है। यह उस वक्त प्रकट होता है जब कोई जरूरतमंद हमारे सामने आता है। उस वक्त हमारे हाथ उसकी मदद के लिए उठ जाते हैं। सेवा भाव हमारे संस्कारों में उसी तरह घुल चुका है जैसे फूल अपनी सुंगध वातावरण महकाते हैं।”

  • सारिका दौनेरिया, कक्षा-ग्यारह।

    “मनुष्य के जीवन का उद्देश्य होता है दूसरों के काम आना। कहा गया है कि जीवन में वही सफल होता है जो दूसरों के काम आता है। जिस तरह कोई पेड़ अपने फल खुद नहीं खाता उसी तरह मनुष्य को सदैव दूसरों की सेवा करने के लिए तत्पर रहना चाहिए।”

  • “भगवान ने हमें इंसान के रूप में जन्म दिया है।मनुष्य का जन्म आसानी से नहीं मिलता। अपने जन्म को निरर्थक नहीं जाने देना चाहिए। यदि हम निस्वार्थ भाव से सबकी सेवा करेंगे तो जरूरत पड़ने पर हमारे साथ भी कोई न कोई अवश्य खड़ा होगा। ”

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